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इस्कान मंदिर

कीर्तन से मिलती है संसारी जीव से मुक्ति

उज्जैन के भरतपुरी प्रशासनिक क्षेत्र में एक त्रिदिवसीय महामहोत्सव 3, 10 व 11 फरवरी 2006 को श्रीश्री राधा मदनमोहन मंदिर की विधिपूर्वक प्राणप्रतिष्ठा की गई। मात्र दस माह में निर्मित तथा 11 फरवरी नित्यानंद त्रयोदशी पर प्राण प्रतिष्ठित यह मंदिर श्रीमान् एल्फ्रेड फोर्ड ने इस्काॅन भक्त अभिनेत्री रानी मुखर्जी की उपस्थिति में लोकार्पित किया। इसे इस्काॅन मंदिर कहा गया।

इसकी संपूर्ण मनोहारी प्रदीर्घ संरचना के अवधारक है प्रकृति प्रेमी सृहद श्रीमदृ भक्तिचारू स्वामीजी महाराज, जिन्होंने अपने गुरू श्रील प्रभुपाद पर अभयचरण धारावाहिक का निर्माण किया तथा औशन आॅव मर्सी शीर्षक पुस्तक की रचना की है। इस असाम्प्रदायिक, एकेश्वरवादी आंदोलन का लक्ष्य है - कृष्ण भावनामृत विज्ञान द्वारा समाज के कल्याण कार्याें में प्रगति लाना। श्रील प्रभुपाद ने इस्काॅन के लक्ष्यों को पूर्ण करने के लिए निम्न 7 उद्देश्यों के साथ इस्काॅन का गठन किया। विश्व में वास्तविक एकता और शांति स्थापित करने के लिए समाज को आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा देना। भगवद् गीता एवं श्रीमद् भागवत में प्रदर्शित कृष्ण चेतना का प्रसार करना। समाज के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के एवं श्रीकृष्ण, परमात्मा के समीप लाना और सभी सदस्यों को एवं मानव समाज में यह विचार प्रसारित करना कि वे सभी श्रीकृष्ण के अभिन्न अंग है। श्री चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन आंदोलन को प्रोत्साहित करना एवं उसकी शिक्षा देना। समाज के सदस्यों के लिए दिव्यलीलाओं को समर्पित एक विशाल धार्मिक स्थल का निर्माण करना।

एक साधारण एवं प्राकृतिक जीवन शैली के उद्देश्य हेतु सभी सदस्यों को एक- दूसरे के समीप लाना। उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पत्रिकाएं, पुस्तकें एवं अन्य लेखन कार्य का प्रकाशन करना।

क्या है इस्काॅन

इस्काॅन नाम अत्यंत लोकप्रिय हुआ, ड्क्षकतु इसका अर्थ अधिकांशतः अबोधगम्य बना हुआ है। इस्काॅन इंटरनेशनल सोसायटी फाॅर कृष्णा काॅन्शसनस अर्थात अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनात्मक संघ का संक्षिप्त नाम है।

सिद्धांत एवं अभ्यास:- इस्काॅन के सदस्यों को चार नियामक नियमों माँस भक्षण (अंडा, प्याज, लहसून आदि) यूतक्रिया, अवैध स्त्री संग एवं मद्य तथा मादक द्रव्यों के सेवन का निषेध करते हुए हरेकृष्ण महामंत्र -

हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे रामा हरे रामा
रामा रामा हरे हरे।।


की 16 माला का जप नित्य प्रति करना तथा भगवान् को भोग लगा हुआ भोजन (प्रसाद) ही ग्रहण करना पालनीय है।

इस्काॅन श्री चैतन्य महाप्रभु के अध्चिन्त्य भेदाभेद तत्व पर आधारित एक एकेश्वरवादी संप्रदाय है जो ब्रह्म-मध्व-गौडिय वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत है। श्रीमद् भागवत में कहा गया है कि कलियुग में एक महान गुण है कि इसमें श्रीकृष्ण का कीर्तन करने पर ही जीव संसार से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त करता है।

’’कलेर्दाेषनिधे राजन्नस्ति होको महान गुणः कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग परम् व्रजेत’’

बंगाल के नवद्वीप में श्री हरिनाम के साथ आविर्भूत श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने इस धराधाम पर श्रीकृष्ण के नाम संकीर्तन को भक्ति का सर्वाेपरि स्वरूप निरूपित किया। ’’हरिनाम’’ प्राण से स्वतः स्फुरित होने वाली आनंद झंकार है। भगवान का आनंदमय स्वरूप नाममय ध्वनि में प्रकाशित होता है। श्रीकृष्ण का एक नाम समस्त पापों का नाश कर देता है। महाप्रभुजी के अनुसार तो केवल हरिनाम ही कलियुग में एकमात्र उद्धारक है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा।

श्रीकृष्ण चैतन्य मार्ग में चलते-चलते प्रेमोन्मत्त होकर उच्च स्वर में संकीर्तन भी करते थे। उन्होंने अपने संकीर्तन द्वारा नूतन आध्यात्मिक क्रांति का अभ्युदय किया। उनके कीर्तन से पशु-पक्षी भी मुग्ध होकर सुध-बुध खो बैठते। इस्काॅन मंदिर उज्जैन में प्रतिदिन भजन कीर्तन होता है तब आरतियों के समय इस्काॅन भक्तों के साथ अनेक दर्शनार्थी भी मृदंग, ढोलक को थाप व हारमोनियम की धुन पर भाव विभोर होकर उछल-उछल कर नृत्य कर उठते हैं। वस्तुतः शुद्ध भाव से संकीर्तन करना परम मंगलकारक है।